ૐ जय जगदीश हरे Om Jai Jagdish Hare Aarti

  Om Jai Jagdish Hare Aarti Lyrics ૐ जय जगदीश हरे प्रत्येक हिन्दू परिवार में गयी जाने वाली भगवान विष्णु, भगवान सत्यनारायण,  पारब्रह्म परमेशर को समर्पित आरती है। पूजा अर्चना या किसी धार्मिक समारोह के अंत में  जय जगदीश हरे आरती को जरूर गया जाता है।.

इस आरती में एक भगत ईशवर के निराकार रूप से प्राथना करता है की, हे ईश्वर ! तुम हो एक अगोचर सबके प्राणपति अर्थात आपको कोई भी भगत अपनी (इन्द्रीओं से प्राप्त नहीं कर सकता ) आँखों से देख नहीं  सकता, तो फिर मैं आपके किस विधि से प्राप्त करूँ अर्थात वो विधि मुझे बता दें।
 

अगोचर का अर्थ है - जिसको अपनी इन्द्रीओं से प्राप्त न किया जाये।

इन्द्रीओं का अर्थ है - मानव शरीर के जितने भी अंग हैं , जैसे की हाथ, पैर, ऑंखें, मस्तिष्क, आदि सभी अंगों को इन्द्रियां कहते हैं ।

 जय जगदीश हरे

स्वामी जय जगदीश हरे

भक्त जनों के संकट

दास जनों के संकट

क्षण में दूर करे

 जय जगदीश हरे

 

जो ध्यावे फल पावे

दुःखबिन से मन का

स्वामी दुःखबिन से मन का

सुख सम्पति घर आवे

सुख सम्पति घर आवे

कष्ट मिटे तन का

 जय जगदीश हरे

मात पिता तुम मेरे

शरण गहूं किसकी

स्वामी शरण गहूं मैं किसकी

तुम बिन और न दूजा

तुम बिन और न दूजा

आस करूं मैं जिसकी

 जय जगदीश हरे

तुम पूरण परमात्मा

तुम अन्तर्यामी

स्वामी तुम अन्तर्यामी

पारब्रह्म परमेश्वर

पारब्रह्म परमेश्वर

तुम सब के स्वामी

 जय जगदीश हरे

तुम करुणा के सागर

तुम पालनकर्ता

स्वामी तुम पालनकर्ता

मैं मूरख फलकामी

मैं सेवक तुम स्वामी

कृपा करो भर्ता

 जय जगदीश हरे

तुम हो एक अगोचर

सबके प्राणपति

स्वामी सबके प्राणपति

किस विधि मिलूं दयामय

किस विधि मिलूं दयामय

तुमको मैं कुमति

 जय जगदीश हरे

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता

ठाकुर तुम मेरे

स्वामी रक्षक तुम मेरे

अपने हाथ उठाओ

अपने शरण लगाओ

द्वार पड़ा तेरे

 जय जगदीश हरे

विषय-विकार मिटाओ

पाप हरो देवा

स्वमी पाप हरो देवा

श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ

श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ

सन्तन की सेवा

 जय जगदीश हरे

 जय जगदीश हरे

स्वामी जय जगदीश हरे

भक्त जनों के संकट

दास जनों के संकट

क्षण में दूर करे

 जय जगदीश हरे

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